• 2 अप्रैल, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ का जन्मदिवस : सुर से प्यार करने वाला इंसान बड़ी खू़बियों का हासिल होता है

    भारतीय शास्त्रीय संगीत में उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ की पहचान एक दिग्गज गायक के रूप में है

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    - ज़ाहिद ख़ान

    भारतीय शास्त्रीय संगीत में उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ की पहचान एक दिग्गज गायक के रूप में है। महान सितारवादक पंडित रविशंकर ने अपनी आत्मकथा 'राग अनुरागयूं में गुलाम अली ख़ाँ की गायकी की अज़्मत को बयां करते हुए एक जगह लिखा है, ''उन जैसा, ठीक उन जैसा और कोई मुझे कभी नहीं लगा। रबीन्द्रनाथ के शब्दों में सभाभंग के काशीनाथ के समान सिर्फ सात सुर ही नहीं, बारहों सुर भी उनके पालतू पक्षी थे। स्वरों पर इस तरह का कंट्रोल किसी के कंठ में आज तक मैंने नहीं देखा है महाशय !यूंयूं (किताब-'राग अनुरागयूं, लेखक-पं. रविशंकर, प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, पेज-125) अपने स्वरों पर वाकई उनका अद्भुत नियंत्रण था। पटियाला घराने की ख़ासियत जो द्रूत तैयारी के साथ तान है, उसे उन जैसा आज तक कोई नहीं गा सका है।

    गुलाम अली ख़ाँ, मुल्क के एक मशहूर मौसीकी घराने, पटियाला घराने से तअल्लुक रखते थे। बीसवीं सदी के आगाज़ 2 अप्रैल, 1901 को अविभाजित भारत के कसूर में, जो कि अब पाकिस्तान में है, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ साहब की पैदाइश हुई। उस ज़माने में कसूर मौसीकी, आर्ट और तहज़ीब के लिए पूरे देश में मशहूर था। ख़ाँ साहब ने पांच बरस की उम्र से अपने वालिद अली बख़्श ख़ाँ और अपने चचा फतेह अली ख़ाँ, काले ख़ाँ से सारंगी व ख़्याल गायकी की इब्तिदाई तालीम ली और शुरुआत के पहलू-ताल, अंतरे और स्थाइयाँ सीखीं। वे घंटो इसका रियाज़ करते। गुलाम अली ख़ाँ ने ज़ल्द ही ख़्याल गायकी पर महारथ हासिल कर ली। और शास्त्रीय संगीत के पटियाला घराने की परंपरा को मुल्क में आगे बढ़ाया। उन्होंने मालकौंस, जयजयवंती, कमोद, केदार, भैरवी और पहाड़ी जैसे रागों को अलग आयाम और नये मायने दिए।

    उन्होंने ख़्याल गायन को इतना ज़बरदस्त और खू़बसूरत बनाया कि लोग उनके गायन के दीवाने हो गए। शास्त्रीय संगीत, ठहराव मांगता है। इसको सुनने के लिए श्रोताओं के पास न सिर्फ समय और धैर्य होना चाहिए, बल्कि संगीत की एक समझ भी लाजि़मी है। जबकि गुलाम अली ख़ाँ इस बात को लेकर रज़ामंद थे कि ''शास्त्रीय संगीत की सुंदरता उसके तात्कालिक प्रदर्शन में है, लेकिन परंपरा के विपरीत उनका मानना था कि श्रोता ज़रूरत से ज़्यादा लंबी प्रस्तुतियों को पसंद नहीं करेंगे।यूंयूं (किताब-सुर के सितारे, लेखक-अमजद अली ख़ान, प्रकाशक-पेंगुइन बुक्स गुड़गाँव, पेज-14) यही वजह है कि श्रोताओं की पसंद को ध्यान में रखकर, उन्होंने हर राग की अवधि और प्रस्तुतिकरण का फै़सला किया। अलबत्ता उनके इस फै़सले की सभी ने हिमायत नहीं की। ख़ास तौर से शास्त्रीय संगीत के शौकीनों को लगता था कि उन्हें इस राग को सुनने के लिए जो तृप्ति मिलना चाहिए, वह नहीं मिली। जबकि गुलाम अली ख़ाँ उस राग को लंबे समय तक गा सकते थे, लेकिन गाते नहीं थे। गुलाम अली ख़ाँ का तकरीबन सारा संगीत रिकॉर्ड है। उनकी तीन-तीन मिनट की छोटी-छोटी रिकॉर्डिंग उपलब्ध हैं, जिसमें उन्होंने बड़ी ही तल्लीनता से मुख़्तलिफ रागों को गाया है।

    उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ ने ख़्याल गायन को वह ऊंचाईयां प्रदान की कि अपने समय में हर एक उनकी गायकी का दीवाना था। यहां तक की राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी उनकी गायकी के मद्दाह थे। आज़ादी के बाद हुए एक सार्वजनिक आयोजन में गुलाम अली ख़ाँ साहब के गायन को सुनने के बाद, गांधी जी ने न सिर्फ उनकी उस वक़्त खुलकर तारीफ की, बल्कि बाद में उन्हें एक प्रशंसा भरा ख़त भी लिखा। गोहर जान के बाद उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ, देश में दूसरे ऐसे गायक थे, जिन्होंने अपने गायन की रिकॉर्डिंग कराईं। शास्त्रीय संगीत से उन्होंने आम लोगों को इस तरह वािकफ कराया, जैसे कि वह लोकप्रिय संगीत हो। गुलाम अली ख़ाँ की ठुमरी, दादरा बेमिसाल थी। ठुमरी को उन्होंने एक नई पहचान दी। वे जब एक बेहतरीन अंदाज़ में ठुमरी पेश करते, तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

    'तोरी तिरछी नज़रिया के बाणयूं, 'प्रभु मोरी नैया पार करोयूं, 'का करूँ सजनी आये न बालमयूं, 'जमुना के तीरयूं, 'याद पिया की आयेयूं, 'अब न मानत श्यामयूं, 'नैना मोरे तरस गए आजा बलमयूं और 'रस के भरे तोरे नयनायूं उस्ताद गुलाम अली ख़ाँ की गायी हुई कुछ बेमिसाल ठुमरियाँ हैं, जो आज भी बड़े चाव से सुनी जाती हैं। यही नहीं उन्होंने भजन भी गाये। राग पहाड़ी में गाया हुआ उनका एक भजन 'हरिओम तित सत जपा करयूं खू़ब मकबूल हुआ।

    फिल्मी दुनिया ने भी कई मर्तबा उनके सामने फिल्मों में गाने के लिए पेशकश की, लेकिन वे इसे ठुकराते रहे। के.आसिफ की क्लासिक फिल्म 'मुगल-ए-आज़मयूं में उन्होंने अपनी शर्तों पर दो ठुमरी 'प्रेम जोगन बन केयूं और 'शुभ दिन आयो राज दुलारायूं गायीं, जो आज भी लोगों के ज़ेहन में बसी हुई हैं। राग सोहनी और रागेश्वरी में गायीं इन ठुमरियों का कोई जवाब नहीं। इन ठुमरियों को सुनो, तो ऐसा लगता है कि खु़द तानसेन इन्हें गा रहे हैं।हमारी नई पीढ़ी को शायद ही इस बात की जानकारी हो कि बंटवारे के बाद उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ पाकिस्तान में ही रह गए थे। क्योंकि वो लाहौर को खू़ब पसंद करते थे, लेकिन जब उन्होंने पाकिस्तान में शास्त्रीय संगीत से छेड़छाड़ और कलाकारों के साथ बुरा बर्ताव देखा, तो साल 1953 में वे भारत चले आए। हिंदुस्तानी हुकूमत ने भी अविभाजित भारत के इस महान कलाकार के प्रति अपना पूरा सम्मान प्रकट करते हुए, उन्हें तुरंत भारतीय नागरिकता प्रदान कर दी। गुलाम अली ख़ाँ भारत आ गए, तो पाकिस्तान रेडियो ने उन पर अघोषित पाबंदी लगा दी। तकरीबन आधी सदी तक पाकिस्तान रेडियो पर उनकी गायी हुई राग-रागनियों पर पाबंदी रही। साल 2009 में जाकर, यह पाबंदी हटी। बावजूद इसके गुलाम अली ख़ाँ साहब, पूरे उपमहाद्वीप के महबूब गायक बने रहे।

    उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ साहब को अपनी बेजोड़ गायकी के लिए कई सम्मानों और पुरस्कारों से नवाज़ा गया। जिनमें से कुछ ख़ास सम्मान हैं-'संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कारयूं(साल 1962), 'संगीत नाटक अकादेमी फेलो.यूं (साल 1967) 'सुर देवतायूं, 'आफताब-ए-मौसीकीयूं, 'संगीत सम्राटयूं, 'शहंशाह-ए-मौसीकीयूं, राष्ट्रपति सम्मान और डॉक्टरेट की मानद उपाधि। भारत सरकार ने गुलाम अली ख़ाँ की गायकी को सराहते हुए, साल 1961 में उन्हें अपने शीर्ष नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्म भूषणयूं से सम्मानित किया। साल 2003 में उन पर एक डाक टिकट जारी भी किया गया। दीगर शास्त्रीय गायक और संगीतकारों की ही तरह उस्ताद गुलाम अली ख़ाँ भी संगीत को इबादत मानते थे। उनकी नज़र में इंसान की जि़ंदगी में संगीत की अहमियत इसलिए है कि ''सुर से प्यार करने वाला इंसान बड़ी खू़बियों का हासिल होता है। मतलब, दिल को दुखाने से गुरेज़ करेगा, ज़ालिम न होगा...।यूंयूं आज दुनिया भर में जब एक-दूसरे समुदाय के प्रति नफरत और दिलों के बीच दूरियां बढ़ी हैं, तब उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ के इस मुहब्बत भरे पैगाम को हर एक तक पहुंचाया जाना चाहिए। ताकि दुनिया में अमन और भाईचारा कायम हो।

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